Nostalgic : Happy Children’s day ❤

Once again I want to return to that summer of 2005 when I was 8 years old.
Fantasizing about making my own decisions but not yet making them.
wanting to be one of the adults but not yet

ready for it.

learning and hearing about things , people and everything that’s in between because I want to and not because I have to.
Once again I want to go back to that place from where I wouldn’t be just thinking about this poem but living it.

मै बड़ी तो हो गई हूं पर..

मैं बड़ी तो हो गई हूं पर दिल अब कुछ छोटा सा लगता है।

वो आंखो की शरारत सूख गई है,

हसीं जैसे लभो से रूठ गई है।
अपने सपने तो पूरे हो रहे है,
पर अपनों से मिलने के नहीं।
पहले मै अपनी कॉलोनी की उन तंग गलियों में बेतःशा दौड़ लगाता था, नंगे पांव , मैले से कपड़े लिए । ना कोई मकसद हुआ करता था ना थी कोई वक़्त की पाबंदी।
अब तो मानो घड़ी के इन कांटो की ग़ुलाम बन गई हूं।
मै अंजान थी कि नए जूते और चमकते सूट की कीमत थी ये।

कीमत तो अदा करना जानती हूं मै,

पर कुछ चीजो कि कीमत ही भूल गई हूं।
मै बड़ी तो हो गई हूं पर………